Wednesday, 10 October 2012

आधार-निराधार

सरकार बड़े शोर शराबे से आधार दे रही है . हम भी निराधार से आधारभूत होने के लिये प्रस्तुत हुए . निलेकनी जी बोल रहे थे बड़ी अच्छी चीज़ है , मुफ्त मिल रही है . आम आदमी हैं , सरकारी चीज़ मुफ्त मिले और हम इन्कार कर दें ?

खैर , उस मुलाक़ात की वर्षगाँठ आ रही है . सोचा उसे याद कर कुछ किया जाए . अब अखबारों में विज्ञापन देने के लिये पैसे तो हैं नहीं. पर आलतू-फालतू विषय पर लिखने की सुविस्ता तो है ही .

अब हिन्दी वालों में अक्ल, बुद्धि , सोफिस्टिकेशन, सुसंस्कृति तो है नहीं . इसलिये सीधे-सीधे ठेल देते हैं .

पहला चित्र : मुलाकात के वक्त का है :

इस मुलाकात के बाद बात आगे बढ़ती नहीं नज़र आई , और वो हमसे कन्नी कटाने लगे . जब घर पर भी जाने से मुलाक़ात न की तो हमने भी पत्राचार का सहारा ले लिया . प्रेमी वैसे ही बेरोजगार होता है . पत्र आजकल डाकवाले अगर स्पीड-पोस्ट न हो तो २०-२५ दिन पहले पहुँचाते  ही नहीं . उसके पास मोबाइल था नहीं की एस.एम.एस. करते अत: ईमेल आदान प्रदान किया . तब भी एक ही जवाब वो घर पर नहीं है. आने पर बोल देंगे . हमने कहा ऐसे  कब तक टरकाते रहेंगे ? फिर क्या था - बोले कासिद ने खत नहीं पहुँचाया है . हमने कासिद के खिलाफ़ शिकायत दर्ज कर ली है . नम्बर भी दिया - ४०३२१९७ तारीख थी - २४ जुलाई , २०१२ .

आज भी उसके कूचे में गए थे . वर्षगाँठ जो आने वाली है.

दूसरा चित्र : उसके कूचे का

   अब भी वह नहीं है . कासिद अगर ऐसा है और वो भी आपकी प्रेमिका ने मुकरर्र कर दिया हो तो आपकी शामत नहीं . सारी उम्र कुंवारे रह जाएँगे .

अगर आपको मेरी प्रेमिका मिले तो उसे मेरी मुलाक़ात के हवाले से बोलियेगा - मजनूँ अब भी देवदास है .


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